स्टॉकहोम सहमति के अनुसार तय हुआ था कि बंदियों का आदान प्रदान होगा और हुदैदा शहर व बंदरगाह में संघर्ष विराम लागू होगा। वास्तव में पहले चरण में यमन संकट में कमी और बाद के चरण में यमन के ख़िलाफ़ जंग का रुकना इस सहमति का मुख्य लक्ष्य था। लेकिन जो कुछ इस सहमति के बाद व्यवहारिक रूप से हुआ है वह यमन संकट के और गहराने का सूचक है। रिपोर्ट के अनुसार, स्टॉकहोम बैठक के बाद से यमन में लगभग 788 लोग मारे गए, 1600 से ज़्यादा घर, 385 फ़ार्म हाउस, 47 दुकानें और 13 स्कूल तबाह हुए।
सवाल यह पैदा होता है कि यमन संकट पर स्टॉकहोम सहमति का उलटा असर क्यों हुआ?
ऐसा लगता है कि सऊदी अरब अपने ऊपर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पड़ रहे दबाव को कम करने के लिए स्टॉकहोम सहमति के लिए तय्यार हुआ। चूंकि तुर्की के इस्तांबूल शहर में सऊदी अरब के वाणिज्य दूतावास में पत्रकार जमाल ख़ाशुक़जी की हत्या के अपराध की वजह से सऊदी अरब पर विश्व स्तर पर दबाव था। इस अपराध की वजह से यमन में मानव त्रासदी के भयावह आयाम सामने आते और विश्व जनमत रियाज़ पर यमन जंग रुकवाने के लिए दबाव डालता। ऐसे हालात में यमन की इस्तीफ़ा दे चुकी सरकार के रियाज़ स्थित प्रतिनिधिमंडल आले सऊद शासन के फ़ैसले को मानते हुए स्टॉकहोम सहमति के लिए तय्यार हुआ ताकि आले सऊद पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव कम हो सके।
अंत में यह कि स्टॉकहोम सहमति के नाकाम होने पर यमन संकट के कम होने की थोड़ी बहुत उम्मीद भी ख़त्म हो जाएगी। इसलिए स्टॉकहोम सहमति को नाकाम होने से रुकवाना बहुत ज़रूरी है जिसके लिए संयुक्त राष्ट्र संघ और पश्चिमी शक्तियों को आगे आना चाहिए।